डांडी कांठी High Himalaya

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सर्वप्रथम आप सभी आगन्तुक सज्जनों कु खुदेड़ प्रवासी मा हार्दिक अभिनन्दन। बहुत दिन बिटि, उत्तराखण्ड सि सम्बन्धित अपड़ी उत्सुकुता का बारा मा आपलोगों दगड़ी बात कना कु मन थैइ कनु। जब भी मैं उत्तराखण्ड का बारा मा कुछ इन्टरनेट फर खोजना की कोशिश करदु , जानकारी य त मिलिदै नी या फिर बहुते कम छन।जख भी देखा चार धाम यात्रा, मसूरी(हनीमून), हरिद्वार(गंगा आरती),नैनीताल और ऋषिकेष(राफ्टिंग) सि इन्टरनेट पर पेज भर्यां, पर मेरा हिसाब सि येका अलावा भी यख देखना कु बहुत कुछ छन।ऊँचा डांडा काँठीयों का बुग्याल बिटि वन संरक्षण, थौला मेला तक सब यखकि शान छन, पर कैतें भी वोंकि पर्याप्त जानकारी नि। ये वास्ता मैन उत्तराखण्ड का बारा मा जानकारी एकत्रित करणा कि खातिर बहुत सारा लोगों का सुझाव एवम सयोंग सि यु ब्लॉग लिखण कु प्रयास करि।ये ब्लॉग मा हम पोस्ट लिखीक, विडियो बनैक, फोटू डालिक, ऑडियो इंटरव्यू द्वारा, मेरा उत्तराखण्ड का भै बैणीयों, दाना सयणों कि आवाज बणिक इन्टरनेट फर कुछ जानकारी लोगों तें प्रदान कना की कोशिश करला।

खुदेड़ प्रवासी शब्द कु अर्थ : बहुत समय तक सोच समझणा का बाद हमन ये ब्लॉग कु नौं खुदेड़ प्रवासी रखि।खुदेड़ वै तें बोल्दा जु अक्सर खुदेंदि रैंदु, अर प्रवासी जु अपड़ा गौं या देश माँ नि रैक कखि और रण लग्युऊं। आप और हम जना लोगों द्वारा खुदेड़ प्रवासी एवम रैबासी का माध्यम सी, औंण वाली पीढ़ी तें समलौंण भेंट देकैं जाणा कु प्रयास छः यु ब्लॉग खुदेड़ प्रवासी।मैं भी ५ वर्ष कु थैइ जब मैंन शिक्षा का खातिर अपडु गांव छोड़ी और तब सि अब तक घर सी दूर कभी यख कभी तख चल्दी रणु। वर्तमान मा मैं अपड़ी धर्मपत्नी दगडी धुंमण  लग्युऊं, जिन मैतै उत्तराखण्ड़ का जनमानस का वास्ता यु ब्लॉग लिखणा कैं प्रेरित करि।

परिकल्पना और उद्देश्य: ये ब्लॉग कु प्रमुख उद्देश्य पुराणी एवम नयी पीढ़ी का, सभी लोगों तें साथ चलीक, अपड़ा संस्कृति, परंपरा, धरोहर एवम भाषा कु संरक्षण कना कु प्रयास छः।मैं अपड़ी तरफ बीटी पहलु कदम रखना कु साहस कनु छे, बाकि कदम त हम सबन साथ मिलिकैं चलण।अगर हम कैभी तरीका सि, अपड़ी यिं विरासत तें बचोंण मा सफल होन्दा, हमतें अति प्रसन्नता ह्वोली।

क्षेत्रीय भाषा संरक्षण: उत्तराखण्ड की क्षेत्रिय भाषा मा बोलचाल दिन प्रतिदिन घटण लग्युऊं । मेरा हिसाब सि अगर इनि हाल रला त हमारी भाषा विलुप्त होना का कगार फर कभी भी जै सकदी।अभी कई घरों मा गढ़वाली बोलणा वाला दादा दादी और माजी पिताजी छें छः पर कई घरों मा त क्वि भी नि। समय का साथ चलण बहुत जरुरी होंदु पर सोचा अगर क्वी भी अपड़ी भाषा न बोललू त अगली पीढ़ी मा भी क्वी नि बोली सकदा क्येक हमन कभी कैं सिखाई तक नि। य हमारी कोशिस होइँ चेन्दी की हम कयें कुछ सिखे क जौला। हर बार हम सरकार तें नि कोसी सकदा की हमारी भाषा कु सरक्षण नि होण  लग्युऊं कुछ सकारात्मक प्रयास ते ह्मवें अपु भी कन पड़ला

सामाजिक अनुरोध: अभी इन्टरनेट पर हमारा बहुत सारा भाईबन्ध, एना छन जु अभी भी अपड़ा घर, जमीन, मूलनिवास भीटी जुड़यां छः ओर वी लोग ज्यादा सि ज्यादा जानकारी इकठ्ठी कना चाँदा, चाहे व कै मंदिर का बारा मा हो या के भुझना का बारा मा हो। अगर मैं यखिली य सब जानकारी जोडुलु त ह्वे सकदु बहुत समय लगी जाऊ, वैका वास्ता मै चांदु कि सभी लोग आपस मा सहयोग करा। कुछ लोग लेख भेजी सकदा मेल का द्वारा, कुछ लोग फोटो त ओर कुछ विडियो भी भेजी सकदा। मैं औं लोगु कु भी अभिनन्दन कन चांदु जु पोस्ट पढ़िक अपड़ा बिचार हम तक भेजी सकदा, ताकि हम और अच्छा लिखू। अभी मैं बहुत समय बीटी घर सी बहार छओं गढ़वाली बोलणा लिखणा मा भी भूल चूक ह्वे सकदी। मैं चांदू आप मैं तें सही करा, ताकि औरो तें सही जानकारी मिलू।

जख तक मेरी समझ छे उत्तराखण्ड माँ बुद्धिजीवी लोगों की कमी नि, और न कभी कमी राइ, बस हम्वाइँ कुछ बच्चो ते अच्छा मार्गदर्शन  देना की जरुरत छ। यही एक शुभअवसर छः पलायन रोकना कु। हमारा बिच आज भी बहुत लोग घिसी पिटी  तकनिकी सी हटकर काम करिकें, आपड़ा रोजगार का साथ औरों तें भी रोजगार देंण लग्यां। अगर हम सब थोड़ा थोड़ा ऐना  सोचला तै ह्वे सकदु रोजगार कु साधन और प्रबल ह्व्ला और हम्वेन घर छोड़ी के दिल्ली बम्बई नि जान पड़लू। परिवार  भी साथ मा रालू , बच्चा भी अपड़ा सामनी बड़ा हौला।  

ये ब्लॉग कु  भाग बनुणु आपकी इच्छा छे पर यिं मुहीम वा लक्ष्य का साथ अपूतें जोड़ी कैं आप भी सुखद महसूस करला। हर  क्वे अपड़ा  तरीका सि भाग ले सकदु क्वी लेखनी त क्वी आलोचक। आप जरूर ५ मिनट चिंतन करा की हम कै टाइप कु सहयोग करि सकदा पर कर्या जरूर।

ब्लॉग की भाषा: ये ब्लॉग का सभी पोस्ट आपतें इंलिश और गढ़वाली मा मिलला, अगर क्वी लिखण चालु त कुमाउँनी मा भी लिखणा की कोशिस राली। इंलिश मा लिखणु कु उद्देश्य जानकारी विश्वस्तर तक पहुंचौनु छः बल्कि गढ़वाली मा लिखणु कु उद्देश्य हमारी भाषा कु संरक्षण प्रदान कनु छः।यु सब आप लोगों का सपोर्ट का बिना सम्भव नि, येका खातिर कदम कदम फर आपकु सहयोग अति आवश्यक छन। आप हैम्वाइँ समय देंदी रावा हम निरंतर लिखदी रौला।

विशेष अनुग्रह : आप ये ब्लॉग की सारी पोस्ट शेयर, मेल , लाइक, फीडबैक, फॉलो अपड़ा दगड्यों व घर वाळु दगडी जरूर साझा करया !!


Whenever I try searching online material related to Uttarakhand, the retrieved information window is usually narrower than my expectation. Most of the stories revolve around pilgrim travel, river rafting, ganga aarti around Haridwar Rishikesh, honeymoon destination hill queen Mussoorie and that is all. I feel that there is lot more to explore, which I will be trying to do via this blog. I took suggestions from many of my friends who also encouraged me by saying ‘yes this can be one of the way to express your feeling for Uttarakhand’ and indeed in this way I can not only promote but also get closer to my culture and language via video compilations, audio, writing and photography.

Khuded Pravasi” came from two word “Khuded” and “Pravasi”. ‘Khuded’ means a person who misses their home quite often and ‘Pravasi’ means a person who is not living in their village or country. In this blog local and expatriate volunteers will describe our culture and tradition, and hopefully this treasure will enable the generation next to remain connected to their roots. I want to confess that I am a “Khuded” who left his village at the age of 5 and from there my unending journey started. I am still traveling all around the globe in different directions. For long I was alone but not anymore, now I am accompanied by my beloved wife, who inspired me to start blogging for a good cause and for the betterment of people from Uttarakhand.

Vision: Vision of the blog is to connect people from all generations for promoting and preserving Uttarakhand’s heritage, values and languages.In an attempt to bring the ‘so busy generations’ together and closer to their roots, I have started this blog. My journey and aim will be fulfilled only when you all join me, and together we will try to preserve our day by day diminishing culture. Hoping to see you soon through your work!

Preserve our regional languages: I personally feel that within 10-15 yrs Uttarakhand’s local languages might just disappear. As per the current scenario in most of the families, grandparents are the only persons communicating in their native languages. I have also come across  a few families where nobody speaks/knows their native language. We made ourself modern which is very good and of course we deserve it, but at the same time we need to pass the gift of our languages, culture, traditions and food to the next generation. Otherwise, we will be left with only half-baked tales of our forgotten language and culture which would not be enough to share and pass and soon it would be abandoned.

Language of blog content: All posts on this blog will be written in english followed by Garhwali or vice versa. This journey can not be completed without your support and motivation, so keep volunteering, reading and sharing your views.

Community request: I have seen many community fellow on internet, who are closely associated with their roots and culture and want to have more information.Their selfless efforts have indeed inspired me.Currently, I am not living in my village, so it is possible that there will some minor mistakes in the contents. Please send me mail, if you find some mistake, specially in the Garhwali writing, as it’s the first time I am penning down my thoughts in Garhwali on a social platform. Please come forward and contact me on my mail if any of you are interested in translating my posts in Kumaoni.

Lets work together and nurture a modern traditional society which is very strongly connected to their roots.

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