‘अक्स’ यु रफा दफा किले नि होन्दु ।

थक गयूं मी यखुलि रै रै की, क्वी चमत्कार किले नि होन्दु?
रोज सुबेर, मी बीजी त जांदू छौं, पर मी ज़िंदू किले नि होन्दु?

अपणो का दियां दर्द मा जी जी कर, अब यन आदत हुएगी मैते,
अब जब कोई बिराणू दर्द भी देन्दुं च, त दर्द किले नि होन्दु ?

मेरा भीतर अब भी कोई ज़िंदू छैं त च, पर मी अब ज़िंदू नि छौं,
वैध जी नाड़ी टटोली की सोचणा छाँ कि मी ज़िंदू किले नि होन्दु?

सरी उम्र ब्याज मा ब्याज ही देण लग्युं च मी,तेरी माया का कर्जा मा,
मी खुद खत्म हुएगी, पर तेरु यु माया कु कर्ज़ खत्म किले नि होन्दु?

यु समाज च जज ,मेरा आँसू छन गवाह,अर दिल च मेरु वकील,
मिन हार जाण यु मुकदमा ‘अक्स’, यु रफा दफा किले नि होन्दु?

लेखक : अतुल सती ‘अक्स’
Language: Garhwali

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पुरानी टिहरी

कोई रहता नहीं है..अब यहाँ,

वो अकेला घर है न,

बिना दरवाजों का, वहाँ..!

 

मेरी एक पागल दोस्त थी,

वो रहती थी,

जो खुद को इस गाँव की,

रानी कहती थी।

 

वो टूटा हुआ मंदिर..है न पीछे,

वहाँ हम..खेलने जाया करते थे,

चढ़ावे के बहाने एक-दो पैसे,

माँ-बाबा से ले आया करते थे।

 

बचपन के उन अजीब खेलों में,

हर पल रूठना-मनाना होता था,

जेब में पैसे हों या न हों,

हमारा तो..रोज बाजार आना-जाना होता था।

 

एक दुकान थी वहाँ,

खिलौनों की,

सब बच्चे उसके आगे ही..खड़े रहते थे,

नए खिलौने लेने की ज़िद पे,

अक्सर वहीं पर अड़े रहते थे।

 

एक जापानी गुड़िया थी..!

भूरे बालों वाली,

जिसे हम रोज..वहाँ देखने जाते थे,

बस कुछ पल देख कर उसे,

घर वापिस चले आते थे।

 

इतने पैसे नहीं थे..किसी के पास,

कि उसे खरीद पाए,

घर ले जा कर उसे,

उस पर अपना हक़ जताए।

 

पर फिर भी मैंने,

कभी मायूशी को..

किसी के पास नहीं देखा,

खुश होने की..ज़्यादा वजह नहीं थी हमारे पास,

पर फिर भी मैंने किसी को..

कभी उदास नहीं देखा।

 

पर उस दिन..सब उदास थे,

जिस दिन कुछ लोग..शहर से आये थे,

ये गाँव तोड़ कर..नए शहर में,

बसने के सपने जब दिखाए थे।

 

अपने ही घरों से,

हमें उन्होंने बेदखल किया,

कोई बड़े साहब आये थे,

सुना है उन्होंने..

यहाँ पर डैम बनाने के लिए,

सिगनेचर कर दिया।

 

हमारी यादों का,

हमारे जज्बातों का,

हमारे इस गांव से रिस्ते का,

उन्होंने कुछ पैसों में..हिसाब लगा लिया।

 

एक मकान मिला है..नई टिहरी में,

कहते हैं खुशनसीब हो,

तुम्हें तुम्हारी..औकात से ज्यादा दिया।

 

कुछ दिनों में तोड़ देंगे,

वो ये बचे-कूचे मकान,

न तो अब वो जापानी गुड़िया होगी,

न ही होगी उसकी वो दूकान।

 

सब कुछ छीन गए वो,

हम कुछ न बचा पाए,

अब शहर के वो पक्के मकान,

सुना है..जो टूटते नहीं हैं, उनमें अब हम..क्या लेकर जाएं..?

 

लेखक : नवीन ब्लाइंडड्रीम्स

Book name: Gaadhe-Phike Rang

Language: hindi