भीमळ की लेतँण और सांदण की परोठी

Parothi
Parothi

क्या आपतें पता छन की गौं मा मट्ठा के पर छोल्दा, दही कै भांडा पर जमाये जांदी? मट्ठा छोळांण वाला बर्तन कैं बोल्दा परेड़ू और दही जमौंण कैं प्रयोग होंदी परोठी।अब तक आपतें पता चलीगी होलु कि आज हम बात कौला परेड़ू और परोठी की काष्ठकला और वांकु हमारा घर बार मा प्रयोग। एक सामान्य परेड़ू लगभग २०-५० लीटर तक कु होन्दु, बाकि कुछ ये सि बड़ा और कुछ छोटा भी होंदा।येका विपरीत परोठी लगभग ३-५ लीटर की होंदी और साइज मा भी कॉम्पैक्ट।

For reading in english: Wooden utensil in himalayans

मैंन त कभी देखि नी पर बड़ा बुजुर्ग बताउँदा कि ये बर्तन बाणोंणक तें चुनेर ब्यवसायिक लोग गौं गौं मा खराद लगौंदा थाई, और वीं जगह पर जतका लोगों तें यु बर्तन छेन्दु लगभग तत्कि बनैक फिर हैका गौं मा खराद लगौंदा थाई।बात जब खराद कि आयी त आपलोगों तें बतौण चांदू कि खराद पानी सी चलण वाली एक टरबाइन टाइप होंदी, जना की आटाचक्की कि टरबाइन, पाणी की धार पर टरबाइन घुमदी और वैका सहारा सी खराद, घूमती खराद फर फिर छेनी और नुकीला सब्बल सी लकड़ी तें खोखला करीक परेड़ू बनाये जांदू।कखि न कखि ये मा पाणी सि चलाये जाण वाली टरबाइन विज्ञानं कु प्रयोग होन्दु।एक बार जब लकड़ी खोखली ह्वे जांदी त वेका बाद काष्ठकार ये पर विभिन्न कलाकृति करदा और  येतें और भी सुन्दर बणाऊंदा।एक बड़ा बर्तन बनाऊंण मा लगभग ३-५ घंटा कु समय लगी जांदू।

ये बर्तन पर दही जमाये जांदी और मट्ठा छोले जांदी, जै वजह सी यु सांदण नाम की लकड़ी सी बणाये जांदू। सांदण की  लकड़ी न त जल्दी फटदी(दरार वगैरह) और ना जल्दी सड़दी।एक बार मट्टा छोलेगी, त परेड़ू तें उल्टु करे जांदू ताकि पाणी सुखी जाऊ, और परेड़ू ख़राब भी न हो। मट्टा छोळांण क तें तीन चीज प्रमुख होंदी
१- लेतण – रौड़ी तें घुमाऊंण मा मदद करदी।
२- रौड़ी – दही छोलदी मट्टा बनौण का खातिर।
३- विडियो देखा और मैं तें भी बतावा – रौड़ी अटकौंण कैं प्रयोग होंदी , ताकि पूरी ताकत सी बिना रौड़ी का संतुलन ख़राब करीक मट्ठा छोले जाऊ।

परोठी कु प्रयोग दही जमौंण का साथ साथ वाद्य यंत्र कांस की थकुली का निस भी रखे जांदू, ताकि खोखला होणा का वजह सि आवाज अच्छी ऐ जांदी। पहली का लोग ब्यो बारात मा सबसी छोटी साइज मा दही की कमोळी लेकें जांदा थाई , पर आज वोकुं स्थान स्टील का ठेकी न लेली।स्टील शरीर तें इतना बढ़िया नि, किले कि ये मा रख्यां खाद्य पदार्थ  का प्रोटीन एवं विटामिन कु संरक्षण काम रांदू जबकि लकड़ी का बर्तन मा काफी हद तक ६० ~ ९० % तक  संरक्षित रांदा और क्वी साइड इफ़ेक्ट भी नी। येका अलावा भी काफी प्रयोग छन, जु समय समय पर बदलेंदी रांदा।

नोट: आज भी उत्तराखण्ड का हर गौं गळा मा घ्यू , दूध और दही मखन संपन्नता का प्रतीक छन। व्यावसायिक रूप लेना का खातिर लोग अब दूध तें ज्यादा महत्व देंदा।

डेक्लाइमर: यिं  पोस्ट की सारी फोटो और विडियो खुदेड़ प्रवासी न क्लिक नई कारी। हमन यी फेसबुक बिटि डाउनलोड कारी। अगर कैन यी पर्सनल क्लिक कारी वु  हमतें वैकि असली कॉपी देखैक क्रेडिट का वास्ता संपर्क करि सकदा।

For reading in english: Wooden utensil in himalayans

आज ये बर्तन की मांग कम होना का कारण,खराद त कखि दिखेन्दि नी,और यिं काष्ठकला मा माहिर चुनेर लोगोंन भी अपड़ा रोजी रोटी का खातिर ब्यवसाय बदली गैना। कला पूर्ण विलुप्ति का कगार फर चली गैनी।जरूरत छन ऐना काष्ठ कलाकारों तें बढ़ावा देणं कु, बल कुछ नि त छोटी परोठी त हम ख़रीदी सकदा।मैं यें कला और वे सी जुड़यां सभी कास्तकारों तें सेवा सौंळि बोल्दु, और यु पोस्ट वोंकि कला तें प्रमोट का वास्ता समर्पित।

Wooden utensil in himalayans

Parothi
Parothi

Do you know that how to make butter from curd in Uttarakhand villages and which utensil used to keep curd for long time. “Paredu” is the utensil used for making butter from curd and “Parothi” is utensil for keeping curd long time.Today post is about two wooden utensil called “Paredu” and “Parothi”.

For reading in garhwali: भीमळ की लेतँण और सांदण की परोठी

A common Paredu can keep 20~50 liter curd while Parothi is very small with 5~10 liter capacity.I have never seen personally but my father said old time there were people called “Chuner” who make this utensil by visiting village to village.For making this utensil keep wood rotating with the help of water turbine and drill with scrape, center part of wood to make hollow round portion in the wood. Once wood is hollow completely in the center part the next work is to do micro work from outer side of the wood to enhance its outside looking. To make one big vessel it took 5~6 hours.

The use of of the vessel is to keep curd milk as well as make butter from curd.
There are 3 main instrument of this process.
1- Rodi – long stick dissolve into curd for churning butter milk.
2- Letan – Its a rope with some small stick to hold in the hand for rotating “Rodi”.
3- Please check photo and let me know this part name, basically this part give support for “Rodi” with wall for giving rotational stability.

Once finished with the process of making butter keep open end down and close end in the air to avoid moisture in the vessel. The other use of the vessel is to hold Brass plate for for making music in folk song with “Daunri and Thali”. The food in this vessel keep protein as it is in the food compare to steel with keeping these minerals only 20~30%, Somehow wood vessel is good for health without any side effect. Parothi and Paredu is made from the wood called “Geenthi” with biological name “Boehmeria Rugulosa” and locally known as “Sandan”.The wood of this tree absorb less water with due to that it avoid moisture and we can keep using it for long time.

For reading in garhwali: भीमळ की लेतँण और सांदण की परोठी

Declaimer: All photos and video in this post is not clicked by “Khuded Pravasi”, we did just editing. It is downloaded from various Facebook groups.If someone clicked it personally please show us original copy in order to receive name in credit part.

Due to demand of this vessel become less and less in the market, the traditional woodcraft maker known as “Chuner” has been change their profession for surviving in daily life. There are few people still left in Rudraprayag and Bageshwar district who are making vessel in winter. This art is sitting in the edge of dying. My message for people reading this post, I understand the way of life and lifestyle both changed but we need to think about preserving this art before complete die, you can not buy big utensil but you can think about to buy small one Parothi. This post is dedicated to all wooden artist who are surviving in their daily life and not getting proper fund or support from others.

आज का दौर की मिक्सी हमारु गों कु सिलौटु

Different Type Of Silbatta
Different Type Of Silbatta

आज कु पुरु पोस्ट होलु सिलौटा पर। अब हम दगडी त काफी लोगों तें पता भी निहोलु कि सिलौटा कि होंदु। चला मैं आपतें बतौन्दु हमारा दौर कु सिलौटु आज का दौर की मिक्सी, चक्की और इमामदस्ता सब एक ही प्रजाति का छन। जतका महत्व घर मा मिक्सी कु छन वतकी महत्व आयुर्वेद मा सिलौटा कु।हिंदी मा यु जु छा सिल बट्टा नौं सि जाणे जांदू।

Also Read:  घेंन्जा खावा स्वस्थ रावा और सर्दी भगावा

मैं बड़ी खुसी होंदी कि लोग यथैंइ तथैंइ बसिगि पर, अपड़ा गौं बीटी सिलौटु भी साथ लिकें गेई, जु लोग नि लेक गेई वों तें मै आज सिलौटा कु महत्व जरूर बतौलु।अब आप सोचण होला लग्यां कि ये कु प्रयोग उत्तराखंड मा ही होंदु पर ना, सिलौटा कु प्रयोग भारत मा राजस्थान, महाराष्ट्र एवं दक्षिण भारत और विश्व मा कौलाम्बिया, दक्षिण अमेरिका खासकर पेरू और बोलीविया की ओर आज भी जारी छन।

Read more wiki:  wikipedia link

सिलौटु चाहे कखि भी हो ये का द्वी भाग होंदा पहलु १-प्लेन पत्थर (सिल – सिलौटु ) २- बट्टा(सिलालौड – बेलण की छार लंन्बु). सिलौटा कु डलु हमेशा एक किनारा पर खड़ु करीक रखी रन्दु और वेका पैथर सिलालौड।जब भी लौंण चटनी पिसण कु मन करदु सिलौटा लटकाई द्य्यावा और पिसण स्टार्ट।हमारा यख सिलौटा कु महत्व और भी बढ़ी जांदू जब वैवाहिक कार्य की पहली हल्दी और एक दिन पहले पकौड़ा कैं दाल पिसण कु कार्य भी ये से शुरुवात होंदु।दाल पिसण सी पहलि टिका लगैक सिलौटा कु आमंत्रण स्वीकार करे जांदू। जु भी हो बल आमंत्रण भी के न हो गौं का ब्यो बारात की रसाण मा ये कु बहुत महत्व छ। वना त बहुत फायदा पर मैं कुछ आयुर्वेदिक और साइंटिफिक फायदा बतौलु।

Byo Barat Wedding
Byo Barat Wedding

आप सिलौटा सि खटाई मजीक अगर कालु  लूँण पिसदा त मिक्स कालु लूँणव स्वस्थ्य का खातिर बेहतर होंदु और पिसदि दूँ आपका कमर और हाथ की फ्री मा कसरत भी ह्वे जांदी। जब भी आप हल्का हल्का कुछ भी चीज पिसदा जनु मिर्च मसाला , त वैका भीतराकु तेल भी तत्कि धीरी धीरी रिसदु जुकी आपतें खाणा मा और स्वाद देन्दु, साथ मा पाचन का हिसाब सी भी जल्दी पाचनशील।सिलौटा हमेशा एक विशेष डला सी बणाये जांदू जैमा कुछ मात्रा का खनिज लवण आटोमेटिक आपतें समय समय पैर आपतें लाभ पहूंचांदा।अब आज का दौर की महत्वपूर्ण बात, भै अगर बिजली कु बिल बचौंण त, सिलौटा कु प्रयोग सर्वोपरि, एक पंथ और कई काज, जु बचाउंदा हमारा रीती रिवाज।    

Read in English:  Mixi of the mountains silbatta

“नमक और चटनी बनाऊँण कैं अगर आप अभी भी सिलौटा लेकें नि आयी त एक बार खरीद करीक ल्यावा और वैकि रशाण जरूर चाखीक देखा।अभी भी गौं मा लोग सिलौटु बनाऊँण लग्यां , और गौं सि नी त शहर मा भी मिली जांदू। रसाण जरूर चखा और औरों ते भी चखावा।अब जब आपतें पता चलीगी त अपड़ा साथ साथ औरों तें भी येकु महत्व जरूर बतावा।”

Mixi of the mountains silbatta

Byo Barat Wedding
Byo Barat Wedding

Today my post is about “Batan” which is called “silbatta” in hindi. It might be possible that some people do not know what it is so, let me give a brief history of this small kitchen utensil which is used to grind spices like other grinder and mortar and pestle.

Also Read:  Ghenja the festival of welcoming winter

With the advent of new technology and easily accessible morden handy machinery the use of silbatta has been greatly reduced.I feel happy that even now there are people who, even after leaving their village have brought their silbatta along, in order to keep the authentic taste alive especially in the himalayan pahadi cuisines. Silbatta is not only used in Uttarakhand but also in many states all around India such as Rajasthan and southern part. It is also used in many countries around the globe like Peru , Bolivia and other southern american states.

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Silbatta is divided into two parts: the first one is called ‘sil’ (plain stone) and second one is ‘batta’ ( a long roller). Usually silbatta is kept  in a clean corner, against a wall. For using it is laid down and generally spices (such as turmeric, cloves, various kinds of leaves) are grinded manually. In Uttarakhand importance of silbatta is a bit high than other parts. During marriage, there is an auspicious ceremony in which turmeric is grinded in silbatta which is then used as a body mask for the bride/groom to be.Silbatta is also popularly used for making split black gram(Udad daal) batter, which is used for making deep fried dishes (pakodas).Silbattas are often marked with tilak(vermillion and turmeric’s holy mark) before performing some traditional rituals. Usually, most of the authentic flavors of wedding cuisines pass through silbatta.

Different Type Of Silbatta
Different Type Of Silbatta

Silbatta has certain scientific and ayurvedic benefits. Slow grinding prevents extreme loss of oil from the food material, thereby retaining its nutritional values.The silbatta stone is also rich in mineral content.It is also a good form of exercise and will also save your penny.

Read in Garhwali:  आज का दौर की मिक्सी हमारु गों कु सिलौटु

“If you are thinking to make rock salt and chutney I would suggest you to try it on silbatta. You can easily buy it from villages and online stores. Now you know the importance of silbatta, so use it for its authentic taste and promote others too. Let me know if you have more information about silbatta”

 

घेंन्जा खावा स्वस्थ रावा और सर्दी भगावा

Glimse Of Ghenja
Glimse Of Ghenja

आज की पोस्ट मैं लिखण लग्यूं घेंन्जा त्यौहार का बारा मा।बहुत सारा पाठक इना होला जौं न यु नौं पहली बार सुनी होलु। चला क्वी बात नी मै प्रयास कोलू परिचय देणा कु।घेंन्जा हमारा यख सर्दियों मा मणाये जाण वाला त्यौहारों मा दूसरा नंबर कु त्यौहार छ(खिचड़ी संग्रांद और बसन्त पंचमी शायद नंबर १)। हर साल गढ़वाल पंचांग का हिसाब सी २७ गते पौष कु ये त्योहार तें मणाऊँदा जु की खिचड़ी संग्रांद सी लगभग २-३ दिन पहली होन्दु।जख बच्चों मा तॅ भारी उत्साह रंदु कि कब घेंन्जा आला और कब माँजी दही की कटोरी और मीठा घेंन्जा खलालि, वखि बड़ा भी खुश लैंदा मा घेंन्जा।ये त्यौहार कु नाउँ ही घेंन्जा व्यंजन का नाउँ बिटि पड़ी।अगर आप ये शब्द पहली बार सुंण लग्यां या कभी नई खायी त हल्का शब्द मा ये कि रेसिपी कु व्याख्यान अगला पहरा मा।

सर्वप्रथम आप गेहूं, चावल, मुंगरी और झंगरियाल एकठु करा और घट या चकी बीटी पिसाई करीक ल्यावा। झंगरियाल जु छा स्वास्थ्य का खातिर बहुत ही बढ़िया होंदु और पाचन भी एकदम मस्त और तुरन्त।एक झटका माँ कैल्शियम, आयरन, प्रोटीन सब मिनरल्स एक साथ मिली जांदा।वैका बाद आटा नार्मल ढंग सी रोटी बनाऊँण वाला आटा की तरह गोंदण।अगर मीठा घेंन्जा खांण त ग़ुड पानी सी आटा गोंदी सकदा नितर सादा पांणी ठीक रंदु।बाद मा रोटी कि छार बेला (जब चकला बेलन नई थै त लोग हाथन थप थप करीक गोंददा थैइ) और बड़ा निम्बू का पातका सी द्वी तरफ लगैक बर्तन फर डाला। बर्तन का निश पराल या सुखीं घास रखी सकदा ताकि घेंन्जा थरा पर फुके न राउ।अगर आप भर्यां घेंन्जा बाणोंण चांदा गाथ पिसिक भी भरी सकदा।

थोड़ा इन्तजार करा और भाप सी हल्की आंच पर पकणं देंदी रावा।५ मिनट मा सब तैयार।थोडी देर बाद भैर निकालिक थोड़ा सुखण देणा का बाद आप दही का साथ ये तें खई सकदा।यु त्यौहार सर्दियों कु छन और मोटू अनाज कु आटु होना का कारण पाचन भी सर्दियों मा अछु ह्वै जांदु। गर्मियों मा पाचन की थोड़ा मुश्किल छः।सबसी बड़ी बात मैं तें पर्सनली घेंन्जा बहुत पसंद न मीठा कम पर भार्यां हर टैम।

बड़ा बुजुर्ग बोल्दा की सर्दियों मा सब्जी कम होंदी, काम धाणी भी गर्मी की अपेक्षा काम रंदु, त घट मा आटु पिसनु कु टाइम मिली जांदू और मोटा अनाज सर्दी का बाद नयी आन्दु।येका सब कारणों सी स्वास्थ्यवर्धक घेंन्जा न जनम लीनी, फिर भी मैं रिसर्च कनु कि और भी क्या कारण रै ह्वालु ये त्यौहार मनाऊंन कु।

मैन काफी पता करि यख तख फ़ोन करीक पर पता नि चली की ये त्यौहार किलैं मनौनंदा अगर आपतें पता छन, ते मितें भी जरूर बतावा।ये त्यौहार सी संबन्धित आप मुँग क्वी कहानी हो तो शेयर करणा की महती कृपा की अपेक्षा रखुदू।क्वी विशेष जानकारी हो घेंन्जा का बारा मा मेल मैसेज कर्या जरूर तब तक तें आज्ञा चांदु आप सभी तें देर सि हि सैई पर घेंन्जा की बधाई।

लास्ट टाइम हामन पूछी की हम घेंजा के मनौन्दा , हमें जबाब मिलिगी और अब पढ़ा येका पैथर की कहानी।  जानकारी देणं वाला कु नौं गोपनीय छ अगर वी बोलला त हम नौं सार्वजानिक करि दयोला।

पुराणा जमाना मा एक महर्षि थै जौंका तीन पुत्र ह्वे। जख पहलु नंबर वालु बेटा बडू ह्वेक बहुत ज्ञानी ध्यानी पाठ पूजा करण वालु बणी। वखि दूसरा नंबर वालु बेटा एक पराक्रमी योद्धा और तीसरा नंबर वालु बेटा वाद्ययंत्र कु ज्ञाता होणा का कारण, वाद्ययंत्र बजोण वालु बणी।दूसुरु बेटा जब भी कुछ राज्य या बड़ी लड़ै जितिक औन्दु त पहलु बेटा और ऋषि बड़ा धूमधाम सि यज्ञ कु आयोजन करदा, लोगों मा उपहार भोजन बाँटदा ये सी द्वी की धन व वैभव की बृद्धि ह्वै। हर सामाजिक पारंम्परिक कार्यक्रम की जान हमेशा तिसुरू बेटा ही होंदु थै पर जब भी ज्ञान ध्यानी लोगों दगडी बात करणा कु अवसर होन्दु ऋषि महाराज अपड़ा प्रथम द्वी पुत्रों तें अगाड़ी करि देंदा थैइ।

अब धीरी धीरी तीसरा पुत्र तें यिं असमानता कु अहसास ह्वे, त वु ऋषि सी बहुत नाराज ह्वे, और कै भी पारंम्परिक कार्यों मा शामिल होणु भी बन्द कर्याली। तीसरा बेटा की अनुपस्थिति मा सारा बार त्यौहार की रौनक और हर्ष उल्लास ही ख़तम ह्वे गैनी।

ऋषि न जब यु देखि त अपड़ा तीनों बेटों तें बुलायी  और तीसरा बेटा की नाराजगी कु कारण पुछि। बेटा न बोली की मैं एक कलाकार छ मि तें धन वैभव सी क्वी मायामोह नी पर मै भी एक समय मौका चांदु जब आप मैं और द्वी भाई मेरी कला तें समर्पित ख़ुशी मनाई सकू । यु सुणिक ऋषि महाराज तें अपड़ी गलती कु अहसास ह्वे और वोन तीसरा बेटा तें वरदान देनी की पूस का महीना जब क्वी त्यौहार नई होन्दा हम तुम्हारी कला तें समर्पित, ठीक बड़ा त्यौहार मकर संग्रांद सि द्वी दिन पहली घेंन्जा नाउँ सी नयु त्यौहार मनौला। आपकी जानकारी तें मैं बतोण चांदू पूस का महीना क्वी शुभकाम नई होंदा फिर भी घेंन्जा एक विशेष त्यौहार का रूप मा मनाये जांदू कला का प्रति समर्पण ऋषि महाराज कु।

नोट :  यी तथ्य सब बुजुर्गों द्वारा मौखिक काल्पनिक घटनाओं आधारित छन और पाठकों का मनोरंजन का खातिर ये तें कहानी कु रूप दिये गये . ये कु कै वास्तविकता सी क्वी संबन्द नि छन।

Ghenja the festival of welcoming winter

Glimse Of Ghenja
Glimse Of Ghenja

Today’s post is about Ghenja.Ghenja is a festival in Garhwal which is celebrated in the poosh month(in english calendar December mid to January mid).Every-year celebration date is different, based on the Indian hindu panchang (panchang is an Indian hindu calendar where different festivals and occasions are marked).It is always 27 gate(date) poosh(Hindu calendar) and this year it was on 12th January.

The word Gheja came from dish name called Ghenja.We prepare ghenja from flour. We grind wheat, rice, corn and barnyard millet (Jhangriyal in local language)together in chakki (Mill) in order to prepare flour of ghenja . In hill the flour is called ‘Mota anaj’ and flour of mota anaj is good for health. Jhangriyal, which can be easily digested, is a rich source of calcium, protein and iron.

First mix flour with sweet water if you are making sweet Ghenja and normal water if making some stuffed one. Make a dough and leave it for 5 minutes. After 5 minutes roll the small dough like round bread. It is prepared in steam you need big lemon leaf covered both side of bread so that it will not stick with each other. One more additional use of lemon leaf is to get flavour of lemon. Now you can put bread inside steam vessel, it will take 10-15 minutes to prepare and you are ready to eat. If you do not have steam vessel just keep it in normal big vessel with some dry grass at bottom to avoid burn and put little water for making steam in vessel and I am sure it will work as this is traditional way of preparing it.

Ghenja is prepared with steam and no oil and other ingredients are required.This is the main reason that it is considered healthy food in winter. It looks like missi roti and prepared like idli in south India or dumpling in china. After 10~15 minutes in steam you can serve it alone or with yummy yogurt of Himalaya. Festival is big in its celebration and represent strong relation of farmer with family.

One thing I am still researching is about why we celebrate this festival ? Is there any ancient story behind it? Currently I can see only health benefit behind it, which can easily understood by seeing its recipe and the way we prepare this.If you have any further details about this festival or you know the story or any interesting fact about the festival please share with all.

Last time we asked that why we celebrate GHENJA and here is the story behind it.We got information from some other people and identity is Confidential and if the will allow us we will disclose the name.

There was a saint in old time who has three son. First one was educator a spiritualist, while second one warrior. Third one was music lover and he become a music instrument player.

All the time when second son won any battle the first one always celebrate it with big level which make them prosperous as well as famous in the surrounding. Third son was a charm of all festival , traditional events due to his high value of musical instruments. Whenever there is discussion about big things , saint always make his first two son as representative.

slowly slowly saint third son feel this inequality and become sad. He stoped to visit any festival and any events in the city.Due to continuous absence of his third son, all festival glory charm was disappearing slowly slowly.

When saint seen this he called all three son and asked youngest one why are you so sad?He said that I am an artist and not have firm interest in name and fame but i need opportunity time for all of you to celebrate my art of instrument and music.

Saint feel his mistake of neglecting his third son so he gave him blessing that we all will celebrate a festival named GHENJA dedicated to you are your work in the month of Poosh(English month Dec mid ~ Jan Mid) when there is no festival just two days before Makar Sankranti. This was the way Ghenja came in existence.

Note: All the facts are imaginary taught by elders, and we make it as story to keep entertaining readers. There is no relation of this story to any reality.

Happy belated Ghenja festival to all beloved 🙂

Glimpse Of Uttarakhand

PC: Ajay Kanyal
PC: Ajay Kanyal

आप ईं पोस्ट तें गढ़वाली मा भी पढ़ी सकदा: क्लिक करा उत्तराखण्ड का बारा मा एक झलक

I was out of Uttarakhand for many years, mapping the globe but still, there is something which attracts me towards the essence of the forests, rivers, mountains and villages of Uttarakhand. Today, I will tell you what are the things in Uttarakhand, which make me to remember the place each day in my routine life.In my first post I will give you a brief information about the Uttarakhand.

Introduction in brief: Uttaranchal became 27th state of India on 9th November 2000 and in January 2007 the name was changed to Uttarakhand.Before becoming an independent state,it was a part of Uttarpradesh. State can be divided into two regions, one is called Garhwal and other is Kumaun. Major part of the state is situated in foothills of himalayas and stretch to plains area.

Dehradun is provisional capital of state and well connected with rails, road, and air.Many political parties are supporting to make Gairsain as a permanent capital due to it’s geographical centrality but, reality seems very far as for now. Recently, state started a kind of winter assembly session in Gairsain and this practice seems to be continuing in near future too.

Nature: Uttarakhand is bestowed with rich natural beauty, wildlife, snow caped mountain and many more. State is the source of India’s most holy rivers ganga and yamuna. If you are nature lover, go for white water rafting in Rishikesh, trekking in phoolon ki ghati(valley of flowers), trip to Badri Kedar, boating in Nainital and wild life safari around Rajaji National Park  or Jim Corbett National Park. Common man is connected to nature via forest, agriculture and there common practices make nature as a part of life and this is the reason that state is well known for a birthplace of chipko aandolan.

Education: Indian military academy(IMA), Oil And Natural Gas Corporation(ONGC) and Wadia Institute of Himalayan Geology are pride of  Uttrakhand. State provide best schooling in India or I can say education capital (Dehradun) of India, Dehradun has many schools which are witness of shaping many leaders, writers, artists and Nainital also follow the same spirit. Rajiv gandhi, Amitabh bachchan and Abhinav Bindra are few of them who are the alumni from Uttarakhand’s education and there is unending list.

Occupation- Most of the people living in villages have livelihood as agriculture, while in the city people are working in government as well as private sector. In last few decades, many new universities and colleges opened in the state, which have given people an opportunity to build career in different fields.

People: State is always known for it’s simplest people with rich culture and tougher lifestyle in daily routine as well as on work. If I will talk about living standard than most of the population is living as a middle class. In cities man and women are working side by side and have equal contribution in each work. While in villages the work system is divided. Women are strong part and  pillar of the family doing majority of the work (leader in household to agriculture routine work), men work in a agricultural field and labour work etc. Previously,  agricultural society worked on give and take relation called padyal(sharing work with each other) but now there are few people in village and padyal culture is rare to see. In city sharing concept is a bit far from villages and all are independent.

Hill station: Uttarakhand is famous for it’s natural scenery, which had attracted many movie directors, writers, photographers. You should never be surprised that while Delhi is heating with 45°C, you still need a jacket if you are visiting Uttarakhand. Out of many, Mussoorie, Nainital, Ranikhet are main hill stations, which are full packed in summer while in winters tourists are there to enjoy snow caped mountains. You can enjoy ski in Auli which also hold winter sports for the state. Recently, due to global warming in many places snowfall is no more or for short time only. The concern of global warming is raising an alarm still hilly area population is enjoying fresh air and natural running water for now. But we don’t know the future?

Migration: Migration(palayan) is vibrant issue in the state and its graph is increasing yearly.There are few reasons behind that, like education and health facilities. Most of the educated people want to work in main cities. Unemployment is another component of migration, people without proper jobs and wages, choose to work in Delhi, Mumbai and earn enough money to support their family. Most of the people are leaving their villages due to above miscellaneous reasons. We need some stable development model to stop migration.

Border security : Border security along china is a critical issue of the state, due to continues migration from remote area. Population in each village is shrinking. Many villages along international border have nobody or very less people living in village, border area may be converted into barren ground sooner or later, so government need to think about these issues by providing basic facility to remote villages.

Agriculture: Many factors related to global warming and various hydro projects on rivers are making weather unstable in the state. Recently it’s common to see hailstone, cloud bursting, downpour suddenly which are ruining the crops and making people helpless. People are doing hard work but output is not good as expected. We need to work with mother nature to provide sustainable development to the state as well as employment to the people.

Sustainable development: Our state is blessed with very good environment for agriculture like vegetables, which are good to make different chunks for protein lovers.If you are regularly visiting villages, you can see families growing vegetables, tomatoes etc on the bank of small rivers, same thing can be done on larger scale. In current market scenario organic products are in demand so, we need to think seriously  about organic farming like Sikkim. Many people also found mushroom and herbal products as the way of reverse migration and I would like to thanks youngster to make it happen. Bamboo handicraft is another source, which is in our tradition and in demand too. All the work which I explained here have training centers where you can get training for couple of months and start your own business or be a part of some business.

Music:  Uttarakhand has a deep rooted culture of music, but unfortunately nobody is bearing the responsibility to take this culture forward. We have various instruments to support music like hudka, dhol, nagada, flute and masak baja. There were many traditions in the past like beda bedun (specially designated people who used to perform in marriages or in some special functions ), painsara (two dhol player who use to prove their expertise by competing with each other on every beat) etc. Music can be used to preserve languages by composing music for folk poems or local language songs. The folk songs are the way to tell your history to future generation. Now a days there are many ways to show your talent to the rest part of the word. In old days it was tough time for new singers to release their album but now a days they can do it via youtube. We must have to promote new singers, writers and all who are associate in this industry for preserving language.

Special Note :  There are many more things in Uttarakhand like Asia’s highest dam (Tehri dam),  Dehradun basmati(variety of rice),  Tehri city submerged under water, Uttarakhand aandolan, Jaagar(Music to please god ), Sangrand(Very month specific date), thaulamela(fair) and many more. I will be trying to post about each topic so keep watching our new post on every Sunday 🙂

आप ईं पोस्ट तें गढ़वाली मा भी पढ़ी सकदा: क्लिक करा उत्तराखण्ड का बारा मा एक झलक

उत्तराखण्ड का बारा मा एक झलक

PC: Ajay Kanyal
PC: Ajay Kanyal

Also read in english: Glimpse Of Uttarakhand

मैं बहुत साल बिटि उत्तराखण्ड सि भैर रैक तैं दुनिया का कोणा कोणा घुमि, पर फिर भी हमारा पहाड़ों की खुशबू , गाड गदिन्यों कु सिसड़ाट और हमारा गौं बिटि दाना सयाणों का रन्त रैबार हि थैइ जिन मितें बार बार अपड़ा तरफ खैंचि। अपड़ा पहला पोस्ट मा, मि आपतें वीं सब उथल पुथल का बारा मा बतौलु जु जु मितैं हमेशा उत्तराखण्ड बिटि जोड़िक रखदी। शुरुवात मि उत्तराखण्ड का सँक्षिप्त विवरण द्वारा करिकैं  आप सबतें आजकल कि परिस्थिति सि अवगत करुलु।  

उत्तराखण्ड कु सँक्षिप्त परिचय: उत्तराखण्ड राज्य कु जन्म ९ नवम्बर २००० मा देश का २७वां राज्य का रूप मा ह्वेइ। २००० ~ २००७ तक राज्य कु नौ उत्तरांचल थैइ जु कि बाद मा जनमानस की भावना तैं ध्यान मा रखिक उत्तराखण्ड मा बदिलीगै। पूर्ण राज्य कु दर्जा मिलण सि पहलि यु उत्तरप्रदेश कु पर्वतीय भाग का रूप मा विख्यात थैई । आप राज्य तैं द्वी क्षेत्रों मा देखि सकदा पहलु गढ़वाल और दुसुरु कुमाऊँ। राज्य कु ज्यादातर भाग पहाड़ी होणा का कारण यें तैं पर्वतीय राज्य बोलण मा संकोच नी होंदु , पर राज्य कु विस्तार मैदानी भाग मा भी काफी छः।

राज्य बणना का बाद देहरादून अस्थाई राजधानी का रूप मा घोषित करिकें, आज राज्य का सभी छोटा बड़ा काम यखि बिटि संचालित होंण लग्यां। देहरादून आज सड़क, रेल एवम हवाई मार्ग द्वारा सारा देश और विदेश सि जुड्युं छः। प्रदेशवासी आज भी अपड़ा स्थायी राजधानी गैरसैंण तें दर्जा दिलौंण कैं संघर्षरत छन। पिछला कुछ साल बिटि गैरसैंण मा शीतकालीन संसद सत्र कु प्रारम्भ ह्वे जु कि एक सकारात्मक प्रयास का रूप मा हम जना नागरिक भी देखण लग्यां।  

प्राकृतिक सुन्दरता: उत्तराखण्ड काफि पुराणा समय बिटि अपड़ी सुन्दरता कें विख्यात छः।चाहे वु विदेशि टॉम अल्टर जना या फिर दिल्ली बंबई मा रण वाला लोग सभी तें उत्तराखण्ड का बर्फ सि ढ़क्यां पहाड़, वन्य जीवन, प्राकृतिक सुन्दरता वा माँ गंगा कु प्रवाह अति पसंद छः। अगर आप प्रकृति प्रेमी व साहसिक छन त आप फूलों की घाटी, राजाजी राष्ट्रीय पार्क और ऋषिकेश मा राफ्टिंग करि सकदा। यखका साधारण आदमी प्रकृति का बहुती करीब छन, जंगल और कृषि सामान्य जीवन कु हिस्सा होणा कारण प्रदेश चिपको आंदोलन जना मुहिम कु मुख्य भाग रैन। कैं तैं भी प्रकृति साथ छेड़छाड़ कतैइ भी पसंद नी रांदी।  

शैक्षिक केंद्र: भारतीय सैन्य अकादमी, ओ.एन.जी. सी, वाडिया, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान, आई.आई.पी. , एफ.आर.आई. , सर्वे ऑफ इंडिया और भारतीय सर्वेक्षण  विभाग प्रदेश तें हमेशा समय समय पर गौरवान्वित करदी रैंन्दा। देश का नामी गिरामी स्कूल कु गढ़ छः उत्तराखण्ड, और वोंमा कुछ देहरादून मा ओर कुछ नैनीताल मा। यखकि शिक्षा न देश का बड़ा बड़ा जन प्रतिनिधि, लेखक, कलाकार और समाजसेवी देनी और वेका उद्धारण छः राजीव गाँधी, अमिताभ बच्चन और अभिनव बिंद्रा जौंन यख बिटि शिक्षा ग्रहण करिक यखकु नौ रोशन करि।

ब्यवसाय: गौं मा रण वाला लोगों कु प्रमुख व्यवसाय कृषि छन और शहर मा रण वाला लोग क़ुछ सरकारी नौकरी कना त कुछ प्राइवेट।पिछला दस साल मा यख बहुत सारा नया विश्वविद्यालय खूलींन जैका बजह सि छात्र लोग नया नया क्षेत्र मा अपड़ु भविष्य सवांरण लग्यां।पहले सि अगर हम तुलना कौला त आज का युवक शिक्षा का प्रति ज्यादा सजग और संवेदनशील छन जु की बहुत सराहनीय पहल छन ।

लोगबाग: यखका लोग बहुत ही साधारण, सांस्कृतिक और मेहनती छन।ज्यादातर लोग मध्यम वर्ग का परिवार सि सम्बन्ध रखदा।शहर मा मनष्यारु वा जनाना, सब एक दूसरा दगडी कन्धा सि कन्धा मिलैक काम करदा।गांव मा आजभी मनष्यारु और जनानु कु काम बंट्यून छन। जख मनस्यारा खेती बाड़ी, ध्याड़ी मजदूरी का काम करदा वखि जनाना गुडे कटै, घास पात पंधेर ओर बळद भैंसों कि देखभाल करदा। प्रदेश मा जनानों कु एक उच्च स्थान छः, घर कु एक महत्वपूर्ण स्तंभ छः, किले कि वि घर से लेकर बण तक कु सारू काम बहुत हि अच्छी तरह निभोन्दा। आज थोड़ा काम कना का तरीका बदलेगी जनु पहलि लोग एक दूसरा का पड्याळ मा जांदा थैइ, बळद नी होन्दा थैइ त क्वी औरुका बळदु न काम चली जांदू थैइ, लेंदी भैंसी ग्वारा नि रंदा त क्वी चाय मा दुधकु एक गिलास दे देन्दु थैइ, पर अब यि चीज थोड़ा कम ह्वेगी, लोग ज्यादा आत्मनिर्भर छन और गांव मा रण वळु की जनसंख्या भी धीरे धीरे कम ह्वणी।

हिल स्टेशन: उत्तराखण्ड कि प्राकृतिक सुन्दरता आप सबुन्न कै न कै फिल्म मा, लेखनी द्वारा कै मैगजीन मा, फोटो कलैंडर मा जरूर देखि ह्वेलि।गर्मी मा जख दिल्ली का लोग भभराणं लग्यां वखि हमारा पहाड़ मा वे मौसम मा भी स्वेटर कि जरुरत पड़दि । यख मसूरी, नैनीताल, रानीखेत जना बहुत सारा हिल स्टेशन छन, जु की गर्मियों मा चखाचख भरयां रंदा और सर्दियों मा लोग बर्फवारी कु आनन्द लेणा कैं जरूर औंदा। अगर आप बर्फ मा खेलणा का शौक़ीन छन औली एक बार जरूर ह्वेक आवा। अब थोड़ा मौसम परिवर्तन वा ग्लोबल वॉर्मिंग कि वजह सि काफी जगह बर्फ पड़नु कम ह्वेगी, अभी त हमारा पहाड़ों मा ताजी हवा पाणी मिलण लगीं पर ग्लोबल वॉर्मिंग का वजह सि अगाड़ी कु पता नी।

पलायन एक समस्या: पलायन त उत्तराखण्ड कि ज्वलन्त समस्या छन, जिंकु निवारण कन अति आवश्यक ह्वेगी। लोगों कु गों मा रण कु रुझान तेजी सि घटण लग्यूं। ये का पैथर जु प्रमुख कारण छन वु शिक्षा, रोजगार एवं स्वास्थय। लोगबाग काम धन्दा का खातिर शहर जांदा और आराम सि तखि बसी जांदा तब चाहे दिल्ली बॉम्बे हो या कलकत्ता, थोड़ा बहुत अच्छा पैसा मिली जांदन एक परिवार चलौंण कै और फिर बच्चा भि अच्छी जगह पढ़ोण कि इच्छा भी पूरी ह्वे जांदी। ये का अलावा बहुत सारा कारण छन जेन लोग अपड़ा गों छोड़िक शहर कि ओर रुख कन लग्यां। ह्मवैं विकास कु कुछ शसक्त मॉडल बणोंण पडलु जै सि पलायन रौके जै सकु।

बॉर्डर सुरक्षा: प्रदेश कि सीमा नेपाल और चाइना सि लगीं होणा का कारण सुरक्षा भी एक बहुत बडु प्रश्न छः। अब जख चाइना न अपड़ा बॉर्डर तक सड़क, रेल ब्यवस्था करीं, वखि हमारा गों का गों खाली ह्वणा ओर कभी भी बंजर जमीन मा तब्दील ह्वे सकदा, ज्यूकि बड़ु सोच कु विषय छः। स्थानीय लोगों तें भोगोलिक ओर सामरिक परिस्थिति ज्यादा पता रांदी, जु कि सिक्योरिटी का हिसाब सि काफी अहम छन, शायद सरकार तें भी यु  देख्यण होलु लगयूं, कम सि कम सीमा फर बेसिक फैसिलिटी त होइँ छेंदी।

संगीत: संगीत कि बात सि मैं याद आयी कि हर बार त्यौहार और मांगलिक कार्य कि शुरुवात यख संगीत सी होंदी। संगीत कि जड़ यख बहुत लम्बी छन पर क्वी भि ये तैं आगाड़ी लेजाण के तत्पर नींन। पहला जना गीत भी कम बंणदा, मांगल गीत सि लेक झुमैला भि कम ह्वेगी (रिकॉर्डिंग मा छन अभी भी)। हमारा यखाका प्रमुख वाद्य यंत्र ढोल, हुड़का, नगारू, मसकबीन और रणसिंग छन।संगीत सि लग्यां हमारा बेडाबेडून्, ढोल सागर बिटि पैंसरा, नब्ती और काफी अवसर का हिसाब सि ताल होंदिन। हम अपड़ा संगीत का माध्यम सि भाषा कु संरक्षण करि सकदा चाहि वु गढ़वाली कुमाउँनी गीत लिखण, कविता पाठ या संगीत कम्पोजीशन कनु ह्वाई। लोकगीत का माध्यम सि अपड़ा ऑण वाली पीढ़ी तें पौराणिक इतिहास कि जानकारी दे सकदा। पुराणा समय मा गीत लोगों तक पहुचौणु बडु मुश्किल काम थैई पर आज आप यूट्यूब का माध्यम सि जनता तें अपड़ी आवाज सुणे सकदा। हम्वाइँ लोकगीत संगीत और लेखन तें अगाड़ी बाढ़ोंण वाला लोगों ते प्रोत्साहित करूयूं छेंदु और वी सभी लोग जु ये मुहीम मा जुड़याँ छन बधाई का पात्र छन ।

कृषि उत्पादन: ग्लोबल वॉर्मिंग हो या यख बणण वाला नदियों फर बड़ा बड़ा हाइड्रो प्रोजेक्ट (डाम  वगैरह) , ये सबका वजह सि और कुछ ह्वे हो च न ह्वे हो पर मौसम परिवर्तन जरूर ह्वे , कखि असामायिक बरखा, ओलों की बौछार ओर कभी बादल फटणा। ये सबका का कारण इथा मेहनत कना का बाद भी फसल बर्बाद ह्वेणी ओर जानमाल कि हानि अलग। ये प्रकृति कु स्वरुप त बदलणू थोड़ा मुश्किल ह्वे सकदी पर हमसब अपूतें प्रकृति का अनुरूप बदली सकदा। खेती भी कई प्रकार कि होंदी जु कि मैं अगला पहरा मा व्याख्यान कनु।

सतत एवं सन्तुलित विकास: हमारू प्रदेश कु काफी सारू भूभाग प्राकृतिक वातावरण सि लेकें मौसमी सब्जियों तें प्रसिद्ध छन। बहुत अच्छी बात ये छ कि लोग बहुत पहले सि सुक्सा बडोंदा जुकि आजकल प्रोटीन कु ध्यान रखण वालु लोगों तें बहुत आकर्षित करदु। अगर आप अपड़ा घर गों जांदा ह्वाला त रास्ता मा गाड़ गदनियों का किनारा लोगों न सब्जी कि क्यारी लगायीं, हम ये तैं थोड़ा और अगाड़ी बढई सकदा। आजकल आर्गेनिक खेती बहुत प्रचलन मा छन हमतें भी यी तकनिकी सिखण पड़लि जना की सिक्किम आर्गेनिक खेती काफी अच्छा स्तर फर कन लगयूं , यि भी पहाड़ी राज्य ओर हम भी। आजकल का बहुत नवयुवक युवतियां हर्बल और मशरूम खेती तें पलायन रोकना कु प्रयास कना छन जु कि बहुत बढ़िया बात छन, मैं खुदेड़ प्रवासी की और सि वोंकु धन्यबाद करदु। हर नया तरीका सि खेती का बाकायदा ट्रेनिंग सेंटर ह्वान्दा आप भी वख जैक, कुछ सीखी सकदा और कै भी व्यवसाय कु हिस्सा या फिर अपडु छोटुसि काम बिटि व्यवसाय शुरू करि सकदा।

सूचना पटल: उत्तराखण्ड का बारा मा लिखण कैं बहुत सारी चीज छन, जनुकी  एशिया कु सबसी बड़ु डैम, देहरादून की बासमती, टिहरी राजा कु महल, उत्तराखण्ड आन्दोलन, देवतों का जागर, महीना की संग्रांद , चैत बैसाख का थौला मेला और भी बहुत कुछ। मैं यों सबुका का बारा मा जरूर लिखुलु, येका वास्ता आप हर इतवार कु एक बार पोस्ट जरूर पढ़ा, और जानकारी कु आनंद ल्यावा।

Language: Garhwali

Also read in english: Glimpse Of Uttarakhand