उत्तराखण्ड का बारा मा एक झलक

PC: Ajay Kanyal
PC: Ajay Kanyal

Also read in english: Glimpse Of Uttarakhand

मैं बहुत साल बिटि उत्तराखण्ड सि भैर रैक तैं दुनिया का कोणा कोणा घुमि, पर फिर भी हमारा पहाड़ों की खुशबू , गाड गदिन्यों कु सिसड़ाट और हमारा गौं बिटि दाना सयाणों का रन्त रैबार हि थैइ जिन मितें बार बार अपड़ा तरफ खैंचि। अपड़ा पहला पोस्ट मा, मि आपतें वीं सब उथल पुथल का बारा मा बतौलु जु जु मितैं हमेशा उत्तराखण्ड बिटि जोड़िक रखदी। शुरुवात मि उत्तराखण्ड का सँक्षिप्त विवरण द्वारा करिकैं  आप सबतें आजकल कि परिस्थिति सि अवगत करुलु।  

उत्तराखण्ड कु सँक्षिप्त परिचय: उत्तराखण्ड राज्य कु जन्म ९ नवम्बर २००० मा देश का २७वां राज्य का रूप मा ह्वेइ। २००० ~ २००७ तक राज्य कु नौ उत्तरांचल थैइ जु कि बाद मा जनमानस की भावना तैं ध्यान मा रखिक उत्तराखण्ड मा बदिलीगै। पूर्ण राज्य कु दर्जा मिलण सि पहलि यु उत्तरप्रदेश कु पर्वतीय भाग का रूप मा विख्यात थैई । आप राज्य तैं द्वी क्षेत्रों मा देखि सकदा पहलु गढ़वाल और दुसुरु कुमाऊँ। राज्य कु ज्यादातर भाग पहाड़ी होणा का कारण यें तैं पर्वतीय राज्य बोलण मा संकोच नी होंदु , पर राज्य कु विस्तार मैदानी भाग मा भी काफी छः।

राज्य बणना का बाद देहरादून अस्थाई राजधानी का रूप मा घोषित करिकें, आज राज्य का सभी छोटा बड़ा काम यखि बिटि संचालित होंण लग्यां। देहरादून आज सड़क, रेल एवम हवाई मार्ग द्वारा सारा देश और विदेश सि जुड्युं छः। प्रदेशवासी आज भी अपड़ा स्थायी राजधानी गैरसैंण तें दर्जा दिलौंण कैं संघर्षरत छन। पिछला कुछ साल बिटि गैरसैंण मा शीतकालीन संसद सत्र कु प्रारम्भ ह्वे जु कि एक सकारात्मक प्रयास का रूप मा हम जना नागरिक भी देखण लग्यां।  

प्राकृतिक सुन्दरता: उत्तराखण्ड काफि पुराणा समय बिटि अपड़ी सुन्दरता कें विख्यात छः।चाहे वु विदेशि टॉम अल्टर जना या फिर दिल्ली बंबई मा रण वाला लोग सभी तें उत्तराखण्ड का बर्फ सि ढ़क्यां पहाड़, वन्य जीवन, प्राकृतिक सुन्दरता वा माँ गंगा कु प्रवाह अति पसंद छः। अगर आप प्रकृति प्रेमी व साहसिक छन त आप फूलों की घाटी, राजाजी राष्ट्रीय पार्क और ऋषिकेश मा राफ्टिंग करि सकदा। यखका साधारण आदमी प्रकृति का बहुती करीब छन, जंगल और कृषि सामान्य जीवन कु हिस्सा होणा कारण प्रदेश चिपको आंदोलन जना मुहिम कु मुख्य भाग रैन। कैं तैं भी प्रकृति साथ छेड़छाड़ कतैइ भी पसंद नी रांदी।  

शैक्षिक केंद्र: भारतीय सैन्य अकादमी, ओ.एन.जी. सी, वाडिया, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान, आई.आई.पी. , एफ.आर.आई. , सर्वे ऑफ इंडिया और भारतीय सर्वेक्षण  विभाग प्रदेश तें हमेशा समय समय पर गौरवान्वित करदी रैंन्दा। देश का नामी गिरामी स्कूल कु गढ़ छः उत्तराखण्ड, और वोंमा कुछ देहरादून मा ओर कुछ नैनीताल मा। यखकि शिक्षा न देश का बड़ा बड़ा जन प्रतिनिधि, लेखक, कलाकार और समाजसेवी देनी और वेका उद्धारण छः राजीव गाँधी, अमिताभ बच्चन और अभिनव बिंद्रा जौंन यख बिटि शिक्षा ग्रहण करिक यखकु नौ रोशन करि।

ब्यवसाय: गौं मा रण वाला लोगों कु प्रमुख व्यवसाय कृषि छन और शहर मा रण वाला लोग क़ुछ सरकारी नौकरी कना त कुछ प्राइवेट।पिछला दस साल मा यख बहुत सारा नया विश्वविद्यालय खूलींन जैका बजह सि छात्र लोग नया नया क्षेत्र मा अपड़ु भविष्य सवांरण लग्यां।पहले सि अगर हम तुलना कौला त आज का युवक शिक्षा का प्रति ज्यादा सजग और संवेदनशील छन जु की बहुत सराहनीय पहल छन ।

लोगबाग: यखका लोग बहुत ही साधारण, सांस्कृतिक और मेहनती छन।ज्यादातर लोग मध्यम वर्ग का परिवार सि सम्बन्ध रखदा।शहर मा मनष्यारु वा जनाना, सब एक दूसरा दगडी कन्धा सि कन्धा मिलैक काम करदा।गांव मा आजभी मनष्यारु और जनानु कु काम बंट्यून छन। जख मनस्यारा खेती बाड़ी, ध्याड़ी मजदूरी का काम करदा वखि जनाना गुडे कटै, घास पात पंधेर ओर बळद भैंसों कि देखभाल करदा। प्रदेश मा जनानों कु एक उच्च स्थान छः, घर कु एक महत्वपूर्ण स्तंभ छः, किले कि वि घर से लेकर बण तक कु सारू काम बहुत हि अच्छी तरह निभोन्दा। आज थोड़ा काम कना का तरीका बदलेगी जनु पहलि लोग एक दूसरा का पड्याळ मा जांदा थैइ, बळद नी होन्दा थैइ त क्वी औरुका बळदु न काम चली जांदू थैइ, लेंदी भैंसी ग्वारा नि रंदा त क्वी चाय मा दुधकु एक गिलास दे देन्दु थैइ, पर अब यि चीज थोड़ा कम ह्वेगी, लोग ज्यादा आत्मनिर्भर छन और गांव मा रण वळु की जनसंख्या भी धीरे धीरे कम ह्वणी।

हिल स्टेशन: उत्तराखण्ड कि प्राकृतिक सुन्दरता आप सबुन्न कै न कै फिल्म मा, लेखनी द्वारा कै मैगजीन मा, फोटो कलैंडर मा जरूर देखि ह्वेलि।गर्मी मा जख दिल्ली का लोग भभराणं लग्यां वखि हमारा पहाड़ मा वे मौसम मा भी स्वेटर कि जरुरत पड़दि । यख मसूरी, नैनीताल, रानीखेत जना बहुत सारा हिल स्टेशन छन, जु की गर्मियों मा चखाचख भरयां रंदा और सर्दियों मा लोग बर्फवारी कु आनन्द लेणा कैं जरूर औंदा। अगर आप बर्फ मा खेलणा का शौक़ीन छन औली एक बार जरूर ह्वेक आवा। अब थोड़ा मौसम परिवर्तन वा ग्लोबल वॉर्मिंग कि वजह सि काफी जगह बर्फ पड़नु कम ह्वेगी, अभी त हमारा पहाड़ों मा ताजी हवा पाणी मिलण लगीं पर ग्लोबल वॉर्मिंग का वजह सि अगाड़ी कु पता नी।

पलायन एक समस्या: पलायन त उत्तराखण्ड कि ज्वलन्त समस्या छन, जिंकु निवारण कन अति आवश्यक ह्वेगी। लोगों कु गों मा रण कु रुझान तेजी सि घटण लग्यूं। ये का पैथर जु प्रमुख कारण छन वु शिक्षा, रोजगार एवं स्वास्थय। लोगबाग काम धन्दा का खातिर शहर जांदा और आराम सि तखि बसी जांदा तब चाहे दिल्ली बॉम्बे हो या कलकत्ता, थोड़ा बहुत अच्छा पैसा मिली जांदन एक परिवार चलौंण कै और फिर बच्चा भि अच्छी जगह पढ़ोण कि इच्छा भी पूरी ह्वे जांदी। ये का अलावा बहुत सारा कारण छन जेन लोग अपड़ा गों छोड़िक शहर कि ओर रुख कन लग्यां। ह्मवैं विकास कु कुछ शसक्त मॉडल बणोंण पडलु जै सि पलायन रौके जै सकु।

बॉर्डर सुरक्षा: प्रदेश कि सीमा नेपाल और चाइना सि लगीं होणा का कारण सुरक्षा भी एक बहुत बडु प्रश्न छः। अब जख चाइना न अपड़ा बॉर्डर तक सड़क, रेल ब्यवस्था करीं, वखि हमारा गों का गों खाली ह्वणा ओर कभी भी बंजर जमीन मा तब्दील ह्वे सकदा, ज्यूकि बड़ु सोच कु विषय छः। स्थानीय लोगों तें भोगोलिक ओर सामरिक परिस्थिति ज्यादा पता रांदी, जु कि सिक्योरिटी का हिसाब सि काफी अहम छन, शायद सरकार तें भी यु  देख्यण होलु लगयूं, कम सि कम सीमा फर बेसिक फैसिलिटी त होइँ छेंदी।

संगीत: संगीत कि बात सि मैं याद आयी कि हर बार त्यौहार और मांगलिक कार्य कि शुरुवात यख संगीत सी होंदी। संगीत कि जड़ यख बहुत लम्बी छन पर क्वी भि ये तैं आगाड़ी लेजाण के तत्पर नींन। पहला जना गीत भी कम बंणदा, मांगल गीत सि लेक झुमैला भि कम ह्वेगी (रिकॉर्डिंग मा छन अभी भी)। हमारा यखाका प्रमुख वाद्य यंत्र ढोल, हुड़का, नगारू, मसकबीन और रणसिंग छन।संगीत सि लग्यां हमारा बेडाबेडून्, ढोल सागर बिटि पैंसरा, नब्ती और काफी अवसर का हिसाब सि ताल होंदिन। हम अपड़ा संगीत का माध्यम सि भाषा कु संरक्षण करि सकदा चाहि वु गढ़वाली कुमाउँनी गीत लिखण, कविता पाठ या संगीत कम्पोजीशन कनु ह्वाई। लोकगीत का माध्यम सि अपड़ा ऑण वाली पीढ़ी तें पौराणिक इतिहास कि जानकारी दे सकदा। पुराणा समय मा गीत लोगों तक पहुचौणु बडु मुश्किल काम थैई पर आज आप यूट्यूब का माध्यम सि जनता तें अपड़ी आवाज सुणे सकदा। हम्वाइँ लोकगीत संगीत और लेखन तें अगाड़ी बाढ़ोंण वाला लोगों ते प्रोत्साहित करूयूं छेंदु और वी सभी लोग जु ये मुहीम मा जुड़याँ छन बधाई का पात्र छन ।

कृषि उत्पादन: ग्लोबल वॉर्मिंग हो या यख बणण वाला नदियों फर बड़ा बड़ा हाइड्रो प्रोजेक्ट (डाम  वगैरह) , ये सबका वजह सि और कुछ ह्वे हो च न ह्वे हो पर मौसम परिवर्तन जरूर ह्वे , कखि असामायिक बरखा, ओलों की बौछार ओर कभी बादल फटणा। ये सबका का कारण इथा मेहनत कना का बाद भी फसल बर्बाद ह्वेणी ओर जानमाल कि हानि अलग। ये प्रकृति कु स्वरुप त बदलणू थोड़ा मुश्किल ह्वे सकदी पर हमसब अपूतें प्रकृति का अनुरूप बदली सकदा। खेती भी कई प्रकार कि होंदी जु कि मैं अगला पहरा मा व्याख्यान कनु।

सतत एवं सन्तुलित विकास: हमारू प्रदेश कु काफी सारू भूभाग प्राकृतिक वातावरण सि लेकें मौसमी सब्जियों तें प्रसिद्ध छन। बहुत अच्छी बात ये छ कि लोग बहुत पहले सि सुक्सा बडोंदा जुकि आजकल प्रोटीन कु ध्यान रखण वालु लोगों तें बहुत आकर्षित करदु। अगर आप अपड़ा घर गों जांदा ह्वाला त रास्ता मा गाड़ गदनियों का किनारा लोगों न सब्जी कि क्यारी लगायीं, हम ये तैं थोड़ा और अगाड़ी बढई सकदा। आजकल आर्गेनिक खेती बहुत प्रचलन मा छन हमतें भी यी तकनिकी सिखण पड़लि जना की सिक्किम आर्गेनिक खेती काफी अच्छा स्तर फर कन लगयूं , यि भी पहाड़ी राज्य ओर हम भी। आजकल का बहुत नवयुवक युवतियां हर्बल और मशरूम खेती तें पलायन रोकना कु प्रयास कना छन जु कि बहुत बढ़िया बात छन, मैं खुदेड़ प्रवासी की और सि वोंकु धन्यबाद करदु। हर नया तरीका सि खेती का बाकायदा ट्रेनिंग सेंटर ह्वान्दा आप भी वख जैक, कुछ सीखी सकदा और कै भी व्यवसाय कु हिस्सा या फिर अपडु छोटुसि काम बिटि व्यवसाय शुरू करि सकदा।

सूचना पटल: उत्तराखण्ड का बारा मा लिखण कैं बहुत सारी चीज छन, जनुकी  एशिया कु सबसी बड़ु डैम, देहरादून की बासमती, टिहरी राजा कु महल, उत्तराखण्ड आन्दोलन, देवतों का जागर, महीना की संग्रांद , चैत बैसाख का थौला मेला और भी बहुत कुछ। मैं यों सबुका का बारा मा जरूर लिखुलु, येका वास्ता आप हर इतवार कु एक बार पोस्ट जरूर पढ़ा, और जानकारी कु आनंद ल्यावा।

Language: Garhwali

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